Tuesday, September 19, 2017

एक लाख 72 हजार परिवारों पर योगी की चाबुक

एक लाख 72 हजार परिवारों पर योगी की चाबुक

एक लाख 72 हजार परिवार आज बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं। बच्चें भूखे हैं और परिवार के मुखिया दिल्ली की सड़कों पर ये सोचकर धक्के खाने को मजबूर हैं कि शायद दिल्ली दरबार में उनकी सुनवाई हो जाए। कानपुर से दिल्ल आयी अंजना सिंह की उम्र 48 साल है और उनके तीन बच्चे हैं। दो लड़कियां हैं जिसमें से एक की शादी होने वाली है। अंजना अब रिटायरमेंट के करीब है और पिछले 17 साल से कानपुर देहात में शिक्षक मित्र है।


पिछले दो महीने से अंजना सिंह को तनख्वाह नहीं मिल रही है। योगी आदित्यनाथ की सरकार का फरमान है कि अब शिक्षक मित्रों की तनख्वाह रोक दी जाए क्योंकि सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। अंजना सिंह कहती हैं। मैं पिछले दो महीने से दर दर भटक रही हूं। मेरे साथ मेरे और भी साथी हैं जो कानपुर देहात से आए हैं। हमें दो महीने से तनख्वाह नहीं मिल रही है और नौकरी भी पक्की नहीं की जा रही है। मैं 17 साल से शिक्षक मित्र हूं और ग्रेजुएट के साथ बीआरटी भी हूं।

अंजना सिह की ही तरह कानपुर देहात से सीमा पाल भी आयी है। इन्हें भी बतौर शिक्षक मित्र ग्रामीण क्षेत्र में 17 साल हो चुके हैं। इन्हें भी दो महीने से तनख्वाह नहीं मिली है। घर की जिम्मेवारी अंजना सिंह के कांधे पर ही है। क्योंकि घर में कमाने वाली ये अकेली महिला हैं। पति मजदूर हैं और आमदनी कोई फिक्स नहीं है। ऐसे में दो महीने से घर में तनख्वाह नहीं आने का मतलब भूख और तंगहाली ही हो सकती है।
सीमा पाल, अंजना सिंह के दिल्ली में अगर आप लूटियन जोन से गुजरे तो जंतर मंतर और कनॉट प्लेस के आसपास आपको हजारों अंजना सिंह और सीमा पाल हाथों में झोले और पानी की बोतल लिए भटकते दिख जाएंगे। इनमें से कोई राम सिंह है तो कोई मलखान। कोई बरेली से है तो कोई आगरा से। यहां तक की गोरखपुर से भी रामशरण अपने परिवार के साथ दिल्ली में न्याय की आस लेकर पहुंचे हैं।  

फैजाबाद से आए श्यामवीर कहते हैं। 2014 में हमें रेग्यूलर अध्यापक की ही तरह 40 हजार रुपये महीना तनख्वाह मिलती थी। 2014 के बाद लगा कि शायद अब दिन सुधर गए हैं। और जल्द ही वो रेग्युलर शिक्षक के पद पर नियुक्त कर दिए जाएंगे। वो दिन रात देश का भविष्य रोशन करने में लगे रहे, बगैर इस बात की परवाह किए कि उनका भविष्य अधर में है।

हालांकि वो पिछली सरकार की बात करना भी नहीं भूलते। रामशरण कहते हैं कि समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान यानी 2014 में उन्हें 40 हजार रुपये महीना वेतन के रूप में दिया जाता था। उसी दौरान अखिलेश सरकार पर विपक्ष की सरकार ने दबाव डाला और मामला कोर्ट तक जा पहुंचा। इस बीच कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश देकर हमारी तनख्वाह रुकवा दी। जिसके बाद शिक्षक मित्रों को समायोजित करने अथवा रेग्युलर टीचर्स के तरह की नौकरी देने की बात की गयी। इसके लिए ग्रेजुएशसन और बीआरटी होना जरूरी तय किया गया। मेरी ही तरह बहुत से शिक्षक मित्र इस परिपाटी पर सही भी पाये गए। लेकिन, फिर भी हमे राजनीतिक मोहरा बना कर इस्तेमाल किया गया और वोट बैंक की राजनीति के चलते हमारे भविष्य से खिलवाड़ किया गया।
मौजूदा सरकार पर आरोप लगाते हुए रामशरण कहते हैं। योगी आदित्यनाथ जब उत्तर प्रदेश का चुनाव लड़ रहे थे तो उन्होंने भी प्रदेश में शिक्षकों के मुद्दें पर कई तबाड़तोड़ भाषण दिए। यहां तक कहा कि अगर सत्ता में आया तो सभी को रेग्युलर कर दूंगा। इस एजेंडे को उन्होंने अपने घोषणा पत्र में भी जगह दी। लेकिन, सत्ता में आने के तीन महीने बाद ही उन्होंने पहले तनख्वाह बंद की उसके बाद 1,72000 शिक्षक मित्रों के पद की कैंसल कर दिए। और प्रदेश के एक लाख 72 हजार लोगों के परिवारों को सड़क पर ला खड़ा किया।

रामशरण का गुस्सा जायज भी हो सकता है। और हो भी क्यों नहीं। जब मामला भविष्य का हो तो गुस्सा जायज है। लखनउ के वरिष्ठ वकील नितेश गुप्ता का कहना है कि सहायक शिक्षक बने करीब 22 हजार शिक्षामित्र ऐसे हैं, जिनके पास वांछनीय योग्यता है, लेकिन हाईकोर्ट ने इस पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने कहा कि ये शिक्षामित्र स्नातक बीटीसी और टीईटी पास हैं। ये सभी करीब 10 सालों से भी ज्यादा समय से काम कर रहे हैं।

वहीं शिक्षामित्रों की ओर से पेश वकील ने कहा कि यह कहना गलत है कि शिक्षामित्रों को नियमित किया गया है। उन्होंने कहा कि सहायक शिक्षकों के रूप में उनकी नियुक्ति हुई है। वकीलों का कहना था कि राज्य में शिक्षकों की कमी को ध्यान में रखते हुए स्कीम के तहत शिक्षामित्रों की नियुक्ति हुई थी। उनकी नियुक्ति पिछले दरवाजे से नहीं हुई थी। शिक्षामित्र पढ़ाना जानते हैं। उनके पास अनुभव है। वे वर्षों से पढ़ा रहे हैं। उम्र के इस पड़ाव में उनके साथ मानवीय रवैया अपनाया जाना चाहिए। 
लेकिन, नेता हमारे मामले को लंबा खींचना चाहते हैं ताकि उन्हें इस मामले से लगातार राजनैतिक लाभ मिलता रहे। मायावती की सरकार में हमे राज्य की शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए रखा गया तो अखिलेश की सरकार में मोहरा बना दिया गया और अब योगी आदित्यनाथ की सरकार में तो हमे दर बदर ही कर दिया गया। कुल मिलाकर प्रदेश के एक लाख 72 हजार परिवार जो इन शिक्षा मित्र या सहायकों के परिवार का हिस्सा हैं वे परेशान हैं, लाचार हैं मजबूर है। वो दिल्ली में शायद इसी लिए मौजूद है कि शायद उनकी फरियाद सरकार सुन ले और शायद उन्हें न्याय मिल जाए।  

योगी ने आखिर क्यों किया 1,72000 शिक्षक मित्रों को बेरोजगार, कहीं 2019 तो नहीं है कारण 
लखनऊ की राजनीति को नजदीक से जानने वालों का कहना है कि शिक्षामित्र अपने समायोजन के लिए यूपी की योगी सरकार पर दबाव बना सकती है। उनका कहना है कि 2019 में लोकसभा चुनाव है। यूपी की राजनीति में शिक्षक भर्ती बड़ा मुद्दा होता है, ऐसे में शिक्षामित्र अपनी बात योगी सरकार से मनवाने के लिए बड़ा कदम भी उठा सकते हैं। पिछली सरकार के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान कई रैलियों में कहा था कि अगर केंद्र शिक्षक भर्ती के नियमों में थोड़ा बदलाव कर दे तो उत्तर प्रदेश के शिक्षामित्रों के शिक्षक बनने का रास्ता साफ हो सकता है।
वहीं, हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने इस मामले को हवा देते हुए एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने शिक्षामित्रों पर सुप्रीम कोर्ट के दिए गए आदेशों पर अपना रुख साफ कर दिया।  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साफ करते हुए कहा है कि शिक्षा मित्रों का मानदेय बढ़ाना हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं है. हमने कैबिनेट बैठक में उनका न्यूनतम मानदेय तय कर दिया है। यानी शिक्षा मित्रों को मानदेय 10,000 रुपये कर दिया गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि दस हजार रुपये का निश्चित मानदेय ही उन्हें मिलेगा। इसमें बढ़ोतरी करना उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है। कोर्ट के आदेश पर उनका मानदेय तय किया गया है।
ये फैसला योगी आदित्यनाथ ने उस समय उठाया है जब 2018 के पहले महीने में हिमाचल प्रदेश, गुजरात, राजस्थान में चुनाव हैं। औऱ इन तीनों की प्रदेशों में शिक्षक मित्रों का मुद्दा भी इतना ही बड़ा है जितना उत्तर प्रदेश में। यानी अगर कोर्ट अपना फैसला बदलता है तो योगी सरकार इस जीत को अपने सिर बांधकर हिमाचल प्रदेश, गुजरात और राजस्थान में प्रचार करेगी और अगर ये मामला लंबा खीचता है तो भी वो इस मामले का प्रचार करेगी।

मायावती क्यों दिखा रहीं हैं सहानभूति? 
बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने उत्तर प्रदेश में शिक्षामित्रोंके साथ हो रही नाइंसाफी पर सहानुभूति व्यक्त की. उन्होंने मांग की कि यूपी सरकार शिक्षामित्रों के प्रति नरम, सकारात्मक और सहयोगपूर्ण रवैया अपनाए.

मायावती ने कहा कि शिक्षामित्रों जिनमें अधिकतर महिलाएं हैं, का जीवन अधर में लटका है. वे लोग सड़क पर आ गए हैं जबकि उनका काम आने वाली पीढ़ी का जीवन सुधारने का है. वे लोग राज्य सरकार से न्याय और सहारा पाने के लिये लगातार आंदोलन कर रहे हैं. लेकिन योगी सरकार उनकी सुध नहीं ले रही है. शिक्षामित्रों का मासिक वेतन दस हजार रूपए तक सीमित कर शिक्षण कार्य करने के लिए मजबूर किया जा रहा है.

बसपा सुप्रीमों ने आगे कहा कि जब शिक्षामित्र न्यायसंगत नीति बना कर समस्या को हल करने की मांग के समर्थन में आंदोलन करते हैं तो योगी सरकार उन पर लाठियां बरसाती है, जोकि न्यायोचित नहीं है. बसपा शिक्षामित्रों पर हो रहे इस तरह के अत्याचार की निंदा करती है. उन्होंने कहा कि यूपी की भाजपा सरकार को सकारात्मक रूख अपनाकर ऐसी नीति बनानी चाहिए जिससे शिक्षामित्रों की नौकरी सही सलामत रहे और वे वापस शिक्षण के काम में जुट जाएं.

गौरतलब है कि शिक्षामित्र अपने मासिक वेतन की बढ़ोतरी और सुविधाओं के लिए योगी सरकार से गुहार लगा रहे है. लेकिन सरकार उनकी मांगों नहीं मान रही. पिछले सप्ताह शिक्षामित्रों ने लखनऊ विधानसभा का घेराव करने की कोशिश की तो पुलिस ने उनपर लाठी चार्ज कर दिया था

समाजवादी पार्टी की सरकार होती तो नहीं भटकते शिक्षक मित्र
समाजवादी पार्टी के मुखिया और तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का मामले पर कहना है कि उनकी सरकार के दौरान शिक्षक मित्रों की भरपूर मदद उनकी सरकार ने की थी।
कोर्ट में मामला जाने से पहले राज्य सरकार उन्हें नियमित शिक्षकों की भांती ही 40 हजार रुपये की तनख्वाह दे रही थी। लेकिन, 2015 में मामला कोर्ट चला गया और कोर्ट के आदेश के बाद जो मानदेय तय किया गया वो शिक्षकों को दिया गया। इसमें समाजवादी सरकार ने राज्य के शिक्षक मित्रों को ये भरोसा दिया था कि अगर वो सरकार में आते हैं तो इस मामले पर जल्द ही कोई हल निकालेंगे। लेकिन, ऐसा हो नहीं पाया। और अब मौजूदा सरकार इस मामले को तूल देकर इसका राजनैतिक फायदा उठाना चाहती है। जो शायद प्रदेश की आम जनता के लिए कतई ठीक नहीं है।

कोर्ट से मिल चुकी है नाकामयाबी
उत्‍तर प्रदेश के 1.72 लाख शिक्षामित्रों के सहायक शिक्षकों के तौर पर समायोजन पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला बीती जुलाई 2017 को ही आ गया था। कोर्ट ने शिक्षामित्रों को राहत देने से इनकार कर दिया था। हालांकि कोर्ट ने कहा है कि एक लाख 38 हजार शिक्षा मित्र बने रहेंगे।

इसके साथ ही जो 72 हजार सहायक शिक्षक जो शिक्षक बन गए हैं यानी BA और TET करके वो अपने पद पर रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे शिक्षामित्रों को 2 मौके मिलेंगे TET पास करने के लिए, जिनका सहायक शिक्षकों के तौर पर समायोजन हुआ था। इसके साथ ही शिक्षामित्रों को उम्र के नियमों में छूट मिलेगी।

UP सरकार ने SC में दायर की कंप्लायंस रिपोर्ट, 17 नवंबर को होगी सुनवाई
इसके पहले उत्तर प्रदेश के 1.72 लाख शिक्षामित्रों के सहायक शिक्षकों के तौर पर समायोजन के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 17 मई को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। उल्‍लेखनीय है कि 12 सिंतबर 2015 को हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के करीब 1.72 लाख शिक्षामित्रों का सहायक शिक्षक के तौर पर समायोजन को निरस्त कर दिया था. इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

शिक्षामित्रों की ओर से सलमान खुर्शीद, अमित सिब्बल, नितेश गुप्ता, जयंत भूषण, आरएस सूरी सहित कई वरिष्ठ वकीलों ने अपनी ओर से दलीलें पेश की थी। शिक्षामित्रों की ओर से पेश अधिकतर वकीलों का कहना था कि शिक्षामित्र वर्षों से काम कर रहे हैं. वे अधर में हैं। लिहाजा, मानवीय आधार पर सहायक शिक्षक के तौर पर शिक्षामित्रों के समायोजन को जारी रखा जाए। साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई कि वह संविधान के अनुच्छेद-142 का इस्तेमाल कर शिक्षामित्रों को राहत प्रदान करें।

शांतिपूर्ण धरने को कैसे दिया गया अंजाम
देश में जब कभी धरनों की बात होती है तो जेहन में दंगे का डर पैदा होता है। हाल की उदहारण ले तो सिरसा में राम रहीम के समर्थकों ने जो किया वो पूरे देश ने देखआ। लेकिन, दिल्ली में तकरीबन 2.50 लाख लोग उत्तर प्रदेश से 10 तारीख से पहुंचे हुए हैं। कुछ अपने परिवार के साथ हैं तो कुछ अकेले ही। दिल्ली में धरने के लिए शिक्षामित्रों को 4 दिन की अनुमति मिली है। धरने को सफल बनाने के लिए शिक्षामित्र संघ के नेताओं ने जिलों से लेकर गांव तक में शिक्षामित्रों से मुलाकात कर दिल्ली जाने का आह्वान किया। हर जिले में इसकी तैयारी बैठक भी की गई। आदर्श शिक्षामित्र वेलफेयर एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष जितेन्द्र शाही ने कहा कि 50 हजार से ज्यादा शिक्षामित्र दिल्ली पहुंच रहे हैं।
इसके अलावा पूरे राज्य के अलग अलग हिस्सों से लोग आ रहे हैं। दिल्ली में धरना 11 सितंबर से 14 सितंबर तक रहा। लेकिन, इस धरने प्रदर्शन के दौरान ना तो दिल्ली के लोगों को ही परेशानी हुई और ना ही कोई अप्रिय घटना दिल्ली में घटी।  

क्या है मांग
शिक्षामित्र संघों के बड़े नेता भी इस बीच दिल्ली पहुंचे शिक्षामित्रों का समायोजन 25 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द कर दिया गया है। वहीं उन्हें टीईटी पास करने के बाद ही भर्ती में मौका देने की बात भी फैसले में है। लेकिन शिक्षामित्र लगातार इसका विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि केन्द्र सरकार कानून में संशोधन कर उन्हें समायोजित कर सकती है। वहीं वे शिक्षक बनने तक समान कार्य, समान वेतन की मांग पर अड़े हैं।




Tuesday, March 14, 2017

भाजपा की उत्तर प्रदेश में जीत के मायने बनाम हिटलरशाही की दस्तक !


कहते हैं लोकतंत्र में जब तक बोलने की आजादी ना हो तो वो लोकतंत्र किसी काम का नहीं है। ठीक इसी तरह से संसद में अगर पक्ष की बात काटने वाला या सवाल करने वाला विपक्ष ना हो तो ऐसी सरकार का निरंकुश होना स्वाभाविक ही नहीं सौ प्रतिश्त संभव भी है।
क्योंकि जब विपक्ष कमजोर होगा तो सत्ता में रहने वाली सरकारें अपनी मनमर्जी करेंगी और सत्ता के नशे में वो फैसलें लेंगी जो उनकी शक्ति को बढ़ा सके।
इसका ताजा उदहारण जेएनयू प्रकरण है और उसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालक का उदहारण। सवाल ये भी उठता है कि आखिर इतनी बड़ी विजय भाजपा को लगातार क्यों मिल रही है। और क्यों देश में लगातार लीडरशीप भी टूट रही है।
इसकी सीधी वजह पर गौर करें तो हम पाएंगे कि इस कारण का सबसे बड़ा कारण हमारे द्वारा चुनी गए वो सरकारें थी जिनकी योजनाएं जन जन तक नहीं पहुंची और भ्रष्टाचार ने अपनी जड़े सिस्टम में बना ली। जिसके बाद सरकार की शक्तियां कुछ हाथों में ही रह गयी और सत्ता की बार बार चाबी मिलने के बाद भी आम लोगों की जिंदगी में बदलाव नहीं आया हां, भ्रष्टाचार की वजह से लोग सरकारों के खिलाफ जरूर आ गए। ऐसे में दिल्ली से एक नयी उम्मीद की किरण तो जरूरी फूटी लेकिन, वो भी आगे चलकर
बिखर गयी। ऐसे में शीर्ष नेतृत्व की सरकार के पास मौका भी था औऱ ताकत भी कि उसने उत्तर प्रदेश में वो इतिहास लिख दिया जो शायद आजतक की किसी पार्टी ने नहीं लिखा।
उत्तर प्रदेश में भाजपा ने 323 सीटों पर विजय पताका फहराई है। वहीं, इस जीत के साथ ही देश का बुद्धिजीवी इस असमंजस में है कि वो लोकतंत्र के इस सबसे बड़े महाकुंभ के खत्म होने के बाद अभिव्यकित की आजादी, दलित की प्रदेश में स्थिति और लॉ एंड ऑर्डर की स्थिति क्या होगी?
इतना ही नहीं देश का बुद्धिजीवी कहीं ना कहीं ये भी मानने लगा है कि अब या तो स्थिति खराब होगी या फिर बेहतर।
खराब इसलिए हो सकती है क्योंकि ये बात तय है कि इस जीत के बाद स्वर्ण जाति के लोगों का दबाव या ये कहें कि उनकी मनमर्जी ज्यादा बढ़ेगी। अब थानों में फिर से पांडे जी, तिवारी जी एक्टिव मोड में दिखाई देंगे और हो सकता है इस बीच पूरे राज्य में एक बार फिर वहीं स्थिति हो जो आज से 20 साल पहले प्रदेश में थी। यानी की स्वर्णजाति की दबंगई।
और ये दबंगई कोई ऐसी भी नहीं है कि सपा और बसपा के राज में खत्म हो गयी हो। हां, कम जरूर हो गयी थी। लेकिन, अब ये बात तयशुदा मानी जा सकती है कि अब दबंगई हो सकती है। शायद सरकार को भी इस बात का अंदाजा हो और वो प्रदेश में शासनव्यवस्था को ठीक रखने की दिशा में काम कर भी रही हो। लेकिन, ये तब तक नहीं माना जा सकता जब तक की प्रदेश के मुखिया का चेहरा साफ नहीं हो जाता। क्योंकि प्रदेश मे लॉ एंड ऑर्डर की स्थिति क्या होगी ये प्रदेश के मुखिया पर भी निर्भर करेंगा।
वहीं, दूसरी ओर स्थिति में सुधार इस तरह भी हो सकता है कि अगर भाजपा सरकार प्रदेश में रोजगार, शिक्षा, और प्रशासन पर ध्यान देती है तो फिर चौमुखी विकास संभव है। जिसके बाद शायद प्रदेश एक नयी दिशा की ओर बढ़े। लेकिन, ऐसा अगर नहीं हुआ तो स्थिति क्या होगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है।