Saturday, May 29, 2010

नक्सलियों का कहर


गुरुवार देर रात नक्सलियों ने ट्रेन पर हमला कर करीब 65 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। इस हमले में 200 से ज्यादा लोग घायल भी हुए हैं। बम धमाका कुर्ला ज्ञानेश्वरी सुपर डीलक्स एक्सप्रेस की पटरी पर किया गया, जिससे इंजन समेत 12 डिब्बे पटरी से उतर गए। आइए जानते हैं नक्सलियों ने कब और कहां किस तरह हमले को अंजाम दिया है।

तमाम अभियानों के बावजूद नक्सलियों का कहर लगातार बढ़ता ही जा रहा है। हावड़ा - कुर्ला ज्ञानेश्वरी सुपर डीलक्स एक्सप्रेस को निशाना बनाकर नक्सलियों ने सरकार को फिर से खुली चुनौती दे डाली है। इस घटना की जिम्मेदारी नक्सल समर्थक संगठन पीसीपीए ने ली है। ये कोई पहली बार नहीं हुआ है जब नक्सलियों ने ट्रेनों को अपना निशाना बनाया हो...इससे पहले भी पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में नक्सलियों ने ट्रेनों को निशाना बनाया है...आइए एक नजर डालते हैं नक्सलियों के ट्रेनों पर किए गए हमलों पर.....

22 अप्रैल 2006

माओवादियों ने लातेहार में आठ घंटे तक एक यात्री ट्रेन को कब्जे में रखा।

मई 2008

माओवादियों ने लातेहार में पांच घंटे तक एक ट्रेन पर कब्जा किया।

27 अक्तूबर 2009

माओवादियों ने पीपुल्स कमेटी अगेंस्ट पुलिस एट्रोसिटीज की ओर से बुलाए गए बंद के दौरान भुवनेश्वर-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस को आठ घंटे तक कब्जे में रखा।

नवंबर 2009

माओवादियों ने झारखंड के सिमदेगा जिले में रेल पटरियों पर विस्फोट किया। एक यात्री ट्रेन पटरी से उतरी जिसमें दो लोगों की मौत हुई और 38 लोग जख्मी हुए।

19 मई 2010

माओवादियों ने पश्चिमी मिदनापुर जिले के झारग्राम के पास पटरियों पर बारूदी सुरंग से विस्फोट किया। एक मालगाड़ी के दो चालक जख्मी हुए और इंजन क्षतिग्रस्त हुआ।

ये वो हमले थे जिनमें ज्यादा जानमाल का नुक्सान नहीं हुआ था। लेकिन इस बार माओवादियों ने बड़े हमले को अंजाम देते हुए करीब 65 लोगों की जान ले ली। एक तरह से नक्सलियों ने सरकार के सख्त अभियान को ठेंगा दिखा दिया है। सरकार भले ही नक्सलियों से सख्ती से निपटने के दावे करे, लेकिन उनकी ताकत बढ़ती ही जा रही है। जो नक्सली कल तक आम आदमी की बेहतरी की बात करते थे अब वही नक्सली आम लोगों को ही मार रहे हैं। कहना गलत नहीं होगा कि नक्सली अब आतंकियों का दूसरा नाम बन चुके हैं।

Tuesday, May 25, 2010

खाप और गौत्र के बीच सियासत


हरियाणा, राजस्थान वेस्टर्न यूपी की राजनीति को गोत्र और खापों से अलग करके देखा ही नहीं जा सकता। इन क्षेत्रों में खाप पंचायत के फैसले के विपक्ष में जाने का मतलब जान से हाथ धोना भी है। अधिकतर मामलों में खाप पंचायत समगोत्र विवाह और प्रेम विवाह जो एक ही गांव में हुआ हो के खिलाफ हैं। केन्द्र सरकार ने खाप पंचायतों को झटका देते हुए हिंदु मैरिज एक्ट में संशोधन करने से इंकार किया है। सरकार का कहना है कि हिंदू मैरिज एक्ट अपने आप में एक परफेक्ट एक्ट है जिसमें अभी बदलाव करने की आवश्यकता नहीं है। एक साक्षात्कार में केन्द्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने मुखर हो रही खाप पंचायातों पर कहा है कि किसी भी हाल में गोत्र के आधार पर ओनर किलिंग और बर्बरतापूर्ण फैसलों को कानूनी रूप से मान्य नहीं माना जाएगा। अगर खाप पंचायातों के फैसलों पर नजर डाली जाये तो जब भी गाँव, जाति, गोत्र, परिवार की 'इज़्ज़त' के नाम पर होने वाली हत्याओं की बात होती है तो जाति पंचायत या खाप पंचायत का ज़िक्र बार-बार होता है । शादी के मामले में यदि खाप पंचायत को कोई आपत्ति हो तो वे युवक और युवती को अलग करने, शादी को रद्द करने, किसी परिवार का समाजाकि बहिष्कार करने या गाँव से निकाल देने और कुछ मामलों में तो युवक या युवती की हत्या तक का फ़ैसला करती है। लेकिन क्या है ये खाप पंचायत और देहात के समाज में इसका दबदबा क्यों कायम है? हमने इस विषय पर और जानकारी एकत्र कर आपके सामने प्रस्तुत की है। खाप पंचायतों का 'सम्मान' के नाम पर फ़ैसला लेने का सिलसिला कितना पुराना है? ऐसा चलन उत्तर भारत में ज़्यादा नज़र आता है. लेकिन ये कोई नई बात नहीं है. ये ख़ासे बहुत पुराने समय से चलता आया है। जैसे जैसे गाँव बसते गए वैसे-वैसे ऐसी रिवायतें बनतीं गई हैं। ये पारंपरिक पंचायतें हैं।
ये खाप पंचायतें हैं क्या? क्या इन्हें कोई आधिकारिक या प्रशासनिक स्वीकृति हासिल है? रिवायती पंचायतें कई तरह की होती हैं। खाप पंचायतें भी पारंपरिक पंचायते है जो आजकल काफ़ी उग्र नज़र आ रही हैं, लेकिन इन्हें कोई आधिकारिक मान्यता प्राप्त नहीं है। खाप पंचायतों में प्रभावशाली लोगों या गोत्र का दबदबा रहता है। साथ ही औरतें इसमें शामिल नहीं होती हैं, न उनका प्रतिनिधि होता है. ये केवल पुरुषों की पंचायत होती है और वहीं फ़ैसले लेते हैं. इसी तरह दलित या तो मौजूद ही नहीं होते और यदि होते भी हैं तो वे स्वतंत्र तौर पर अपनी बात किस हद तक रख सकते हैं, ये यहां कहने या लिखने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि खाप पंचायातें जाट और गुर्जर समूह के लोगों की होती है। युवा वर्ग को भी खाप पंचायत की बैठकों में बोलने का हक नहीं होता। कैसे होता है खाप पंचायातों का गठन एक गोत्र या फिर बिरादरी के सभी गोत्र मिलकर खाप पंचायत बनाते हैं। ये फिर पाँच गाँवों की हो सकती है या 20-25 गाँवों की भी हो सकती है. मेहम बहुत बड़ी खाप पंचायत और ऐसी और भी पंचायतें हैं। जो गोत्र जिस इलाक़े में ज़्यादा प्रभावशाली होता है, उसी का उस खाप पंचायत में ज़्यादा दबदबा होता है. कम जनसंख्या वाले गोत्र भी पंचायत में शामिल होते हैं लेकिन प्रभावशाली गोत्र की ही खाप पंचायत में चलती है. सभी गाँव निवासियों को बैठक में बुलाया जाता है, चाहे वे आएँ या न आएँ...और जो भी फ़ैसला लिया जाता है उसे सर्वसम्मति से लिया गया फ़ैसला बताया जाता है और ये सभी पर बाध्य होता है.। सबसे पहली खाप पंचायतें जाटों की थीं. विशेष तौर पर पंजाब-हरियाणा के देहाती इलाक़ों में जाटों के पास भूमि है, प्रशासन और राजनीति में इनका ख़ासा प्रभाव है, जनसंख्या भी काफ़ी ज़्यादा है। इन राज्यों में ये प्रभावशाली जाति है और इसीलिए इनका दबदबा भी है। खाप पंचायतों के लिए गए फ़ैसलों को कहाँ तक सर्वसम्मति से लिए गए फ़ैसले कहा जाए? लोकतंत्र के बाद जब सभी लोग समान हैं. इस हालात में यदि लड़का लड़की ख़ुद अपने फ़ैसले लें तो उन्हें क़ानून तौर पर अधिकार तो है लेकिन रिवायती तौर पर नहीं है। खाप पंचायतों में प्रभावशाली लोगों या गोत्र का दबदबा रहता है. साथ ही औरतें इसमें शामिल नहीं होती हैं, न उनका प्रतिनिधि होता है. ये केवल पुरुषों की पंचायत होती है और वहीं फ़ैसले लेते हैं। एक गाँव जहाँ पाँच गोत्र थे, आज वहाँ 15 या 20 गोत्र वाले लोग हैं. छोटे गाँव बड़े गाँव बन गए हैं. पुरानी पद्धति के अनुसार जातियों के बीच या गोत्रों के बीच संबंधों पर जो प्रतिबंध लगाए गए थे, उन्हें निभाना अब मुश्किल हो गया है। जब लड़कियों की जनसंख्या पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पहले से ही कम है और लड़कों की संख्या ज़्यादा है, तो समाज में तनाव पैदा होना स्वभाविक है। ये आधिकारिक तौर पर मान्यता प्राप्त पंचायतें नहीं हैं बल्कि पारंपरिक पंचायत हैं, इसलिए इसलिए आधुनिक भारत में यदि किसी वर्ग को असुरक्षा की भावना महसूस हो रही है या वह अपने घटते प्रभाव को लेकर चिंतित है तो वह है खाप पंचायत...इसीलिए खाप पंचायतें संवेदनशील और भावुक मुद्दों को उठाती हैं ताकि उन्हें आम लोगों का समर्थन प्राप्त हो सके और इसमें उन्हें कामयाबी भी मिलती है। पिछले कुछ वर्षों में जो किस्से सामने आए हैं वो केवल भागकर शादी करने के नहीं हैं. उनमें से अनेक मामले तो माता-पिता की रज़ामंदी के साथ शादी के भी है पर पंचायत ने गोत्र के आधार पर इन्हें नामंज़ूर कर दिया। खाप पंचायतों का रवैया तो ये है - 'छोरे तो हाथ से निकल गए, छोरियों को पकड़ कर रखो.' इसीलिए लड़कियाँ को ही परंपराओं, प्रतिष्ठा और सम्मान का बोझ ढोने का ज़रिया बना दिया गया है। ये बहुत विस्फोटक स्थिति है.
इस पूरे प्रकरण में प्रशासन और सरकार लाचार से क्यों नज़र आते हैं?
प्रशासन और सरकार में वहीं लोग बैठे हैं जो इसी समाज में पैदा और पले-बढ़े हैं. यदि वे समझते हैं कि उनके सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को औरत को नियंत्रण में रखकर ही आगे बढ़ाया जा सकता है तो वे भी इन पंचायतों का विरोध नहीं करेंगे।
आधुनिकता और विकास के कई पैमाने हो सकते हैं लेकिन देहात में ये प्रगति जो आपको नज़र आ रही है, वो कई मायनों में सतही है। खतरनाक मोड़ पर खाप पंचायत पिछले कुछ समय से खाप पंचायतें सिर्फ दो वजहों से चर्चा में आई हैं। या तो किसी मुद्दे पर धरना या रास्ता जाम करने के लिए या फिर किसी प्रेमी जोड़े को सजा सुनाने के लिए। इधर वे फिर ऐसे ही कुछ कारणों से चर्चा में हैं। कुरुक्षेत्र में विभिन्न जातीय खापों ने एक स्वर में मनोज-बबली हत्याकांड के दोषियों से हमदर्दी जताते हुए अदालती फैसले की न केवल निंदा की है, बल्कि फांसी की सजा पाए लोगों का केस लड़ने के लिए हर घर से 10-10 रुपये जुटाकर हाई कोर्ट जाने का फैसला किया है। इसके अलावा उन्होंने एक ही गोत्र में शादी पर पाबंदी लगाने के लिए हिंदू मैरेज एक्ट 1955 में संशोधन करने की भी मांग की है। सरकार पर दबाव बनाने के लिए हरियाणा की सभी खापें राज्य में प्रस्तावित पंचायत चुनावों के बहिष्कार का मन भी बना रही हैं। खुद को सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं का प्रहरी मानने वाली ये खाप पंचायतें समानांतर न्यायिक प्रक्रिया चलाने की कोशिश में हैं। ये अनेक कानूनों, कोर्ट के फैसलों और नए रिवाजों को अपनी संस्कृति पर एक बड़ा संकट मानते हुए उनके खिलाफ लामबंद होने लगी हैं।
ऋग्वेद में उल्लेख - सबसे पहले खापों का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। उस समय एक विशेष गोत्र के लोग मिलकर अपना एक चौधरी चुन लिया करते थे। एक खाप कई गांवों को मिलाकर बनती है और विभिन्न खापों को मिलाकर सर्वखाप बनती है। अब खाप के मुखिया का चयन चुनाव की बजाय वंशानुगत आधार पर होता है। यानी कि एक ही परिवार के लोग पीढ़ी दर पीढ़ी खाप के मुखिया बनते हैं। जातीय खापों का उद्भव भी बहुत पुराना है। मुगलों के शासन में खापों का प्रभाव इसलिए बढ़ा क्योंकि अर्थाभाव, आवागमन के साधनों की कमी और जागरूकता के अभाव के कारण गांव-समाज का हर व्यक्ति न्याय के लिए राजा के दरवाजे तक दौड़ नहीं लगा सकता था। अंग्रेजों से सहयोग
अंग्रेजी शासनकाल में भी यही व्यवस्था रही। अंग्रेजों ने भारत पर शासन करने की नीति के तहत खाप मुखियाओं की पीठ पर अपना हाथ रखा। प्रथम तथा द्वितीय महायुद्ध में दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों से फौज में भीतर के मामलों में अधिकांश खाप मुखियाओं ने सक्रिय योगदान दिया। गांवों से अनाज तथा दूसरी वस्तुएं सौगात के रूप में अंग्रेज शासकों को मिलीं। प्रत्युत्तर में उन शासकों ने खाप और उसके मुखियाओं को जमीन-जागीरों से नवाजा। जिलों के डिप्टी कमिश्नरों के यहां और तहसीलों में अधिकांश खापों के मुखियाओं की खास खातिर होने लगी। इन संपर्कों के जरिए गांवों से स्वतंत्रता सेनानियों की गतिविधियों की सूचनाएं भी विदेशी शासन तक आसानी से पहुंचने लगीं। इस तरह ज्यादातर खाप अंग्रेजों की दास ही बनी रहीं। हालांकि कुछ ने स्वाधीनता आंदोलन में शामिल नेताओं को भी सहयोग दिया।
उस समय तक पेशावर से लेकर दिल्ली तक पंजाब था। पंजाब के क्षेत्र में मिसलों और आज के हरियाणा क्षेत्र में स्थित जातीय खापों विशेष रूप से जाट खापों ने सामाजिक क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए। यही स्थिति पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में रही। यहीं से खापों ने अपने सामाजिक दायित्व के साथ अपनी राजनीतिक शक्ति को भी पहचाना। 1967 के बाद जब भारतीय चुनावों पर जातीय रंग चढ़ने लगा, राजनीतिज्ञों ने खापों की ताकत को पहचाना और पाया कि खापों के चबूतरे पर हुक्का गुड़गुड़ाते मुखिया जो फैसला करते हैं उस पर एक नहीं बल्कि उनके अधीन 12 से लेकर 36 गांव तक अमल करते हैं। लोटे में नमक डाल कर कसम खाना बहुत बड़ी बात मानी जाने लगी। राजनेताओं ने जमकर इसका लाभ उठाना शुरू कर दिया। यहीं से खापें अपना सामाजिक दायित्व भूल कर सियासी भूमिका निभाने लगीं। राजनेताओं ने भी खाप मुखियाओं को पुरस्कृत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जब उन्होंने हाथ काट दो, गला रेत दो, गांव से निकाल दो, पत्नी को बहन मान लो जैसे मध्ययुगीन फैसले दिए, राजनीतिक नेतृत्व ने मौन रहना बेहतर समझा। इससे खापों का हौसला बढ़ा। इन दिनों खापों में जो हो रहा है, यह उसी का परिणाम है।
वोट की राजनीति
वोट की राजनीति के तहत खापों का खूब दोहन किया गया है। हरियाणा में सोनीपत, रोहतक, हिसार, भिवानी और जींद ऐसे जिले हैं, जहां खापों का सबसे अधिक प्रभाव है। इसी तरह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मेरठ, मुजफ्फरनगर, बागपत आदि में खापों का बहुत अधिक प्रभाव है। वेस्टर्न यूपी में जाटों की प्राचीन खाप इस इक्कीसवीं सदी में भी सामाजिक-राजनीतिक सत्ता का केंद्र बनी हुई है। इसकी मिसाल 84 गावों वाली बालियान खाप के प्रमुख महेंद्र सिंह टिकैत के रूप में देखी जा सकती है, जिन्होंने एक समय बहुत बड़ा किसान आंदोलन चलाकर सत्ता को हिलाकर रख दिया था।

हरियाणा में महम चौबीसी भी इसी तरह की प्रभावशाली खाप है। यूं तो विभिन्न जातियों की खापें हैं लेकिन मौजूदा दौर में अगर किसी ने खाप के जरिए अपनी ताकत और हैसियत का अहसास करवाने की कोशिश की है तो वह है जाट समाज। इस इलाके के सियासी स्वरूप पर नजर डालें तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा की राजनीति में भी जाटों का ही वर्चस्व रहा है। यानी खाप और उसके पीछे खड़ा जनमानस वोट में तब्दील होकर सत्ताओं में भागीदारी करता आया है।

लेकिन इन खापों की समानांतर अदालतें और उनके मध्ययुगीन फैसले आज इंटरनेट और सूचना प्रौद्योगिकी के बल पर आगे बढ़ती दुनिया को मंजूर नहीं हैं। साफ बात है कि अगर राजनेता इन जातीय खापों को अपने वोटों की पेटी मानना छोड़ दें तो मामला पटरी पर आ सकता है। पानी सिर से निकलने को है। तत्काल कोई गंभीर कदम उठाने की जरूरत खाप पंचायातों के नाम पर सिकती राजनैतिक रोटियां मनोज बबली हत्याकांड में दोषियों को सजा होने के बाद चर्चा में आयी खाप पंचयात अब राजनीति का आखड़ा बनती जा रही है। जहां एक ओर खाप पंचायत इसे षडयंत्र मानकर इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जाने का मन बना चुके हैं, वही अब खाप पंचायतों को लेकर हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट, गुर्जर बाहुल इलाकों में इन पंचायतों को देश के विभिन्न राजनैतिक दल अपने पक्ष में करने में जुटे है। हरियाणा की राजनीति में लगभग 35 फीसद भागीदारी रखने वाले जाट वोट बैंक को अपने कब्जें में करने के लिए हरियाणा मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला,, कांग्रेस के नवीन जिंदल जैसे दिग्गज नेता खाप पंचायतों को अपने पक्ष में लेने और खाप पंचायतों के साथ उनके समर्थकों की सहानुभुति लेने की होड़ मची गयी है। ठीक ऐसा ही राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में हो रहा है। खाप पंचायतों को रिझाने के लिए देश की राजनैतिक पार्टियां इन्हें प्रलोभन दे रही है कि वह उनकी मांगों को पूरा करवाने में उनकी सहायता करेंगे। इस मामले पर अगर हाल के राजनेताओं के दौरों पर नजर डाली जाये तो खाप पंचायतों के हिंदू मैरिज एक्ट सहित अन्य मांगों को लेकर चलाए जा रहे आंदोलन में सांसद नवीन जिंदल ने खाप पंचायतों से उनकी मांगों का ज्ञापन लिया है जिसे उन्होंने केन्द्र की सरकार व कांग्रेस हाईकमान तक पहुंचाने का वायदा किया है। उन्होंने कहा है कि खाप पंचायत की भावनाओं को आलाकामन तक पहुंचाना उनका कर्तव्य है। हालांकि अब केन्द्रीय कानून मंत्री और गृह मंत्रालय से आयी टिप्पडि़यों के बाद नवीन जिंदल अपने वायदों पर सफाई देते नजर आ रहे हैं। वहीं खाप पंचायतों और उनके समर्थकों का कहना है कि कुछ भ्रमित युवक युवतियां पाश्चात्य संस्कृति से प्रेरित होकर सामाजिक परंपराओं के खिलाफ जा रहे हैं। रीति रिवाजों की सुरक्षा करना हमारा धर्म है। इसके लिए पूरे हरियाणा के सभी सांसदों, विधायकों एवं अन्य राजनीतिज्ञों से भी सहयोग की अपील की जाएगी। इस मांग को पूरा करवाने के लिए गांव स्तर पर इकाइयों का गठन होगा। खाप पंचायत के समर्थकों का ये भी कहना है कि हिंदू मैरिज एक्ट में संशोधन, समगोत्र में विवाह पर प्रतिबंध, मां के गोत्र में विवाह एवं सीमा के साथ लगते गांव में विवाह प्रतिबंध लगाना चाहिए। नवीन जिंदल ने सहमति जताते हुए कहा है, वे उनकी मांगों को सरकार और हाईकमान तक पहुंचाएंगे। खापों ने जो संस्कृति को बचाने का बीड़ा उठाया है वह प्रशंसनीय है। वह कानून के दायरे में रहकर खाप प्रतिनिधियों की हर संभव मदद करेंगे। उन्होंने खापों का आह्वान किया कि वे दहेज एवं भ्रूण हत्या के खिलाफ भी आवाज उठाएं तथा समाज का मार्गदर्शन करें। खाप प्रतिनिधियों ने राज्य के अन्य नौ सांसदों एवं दो राज्यसभा सदस्यों को 25 मई तक का अल्टीमेटम भी दिया है। जिसमें खापों ने कहा है कि अगर वह उनका समर्थन नहीं देंगे तो वह उनके खिलाफ आंदोलन छेड़ देंगे। दूसरी ओर भाजपा विधायक दल के नेता अनिल बिज ने कहा, आज नवीन जिंदल खाप पंचायतों की राजनीति में उतर आये हैं। वह पहले कहां थे ? चौटाला की राजनीति पर फिरा पानी खापों के मुद्दे पर पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला भी हाथ अजमाने में लगे हैं और खापों का समर्थन लेने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। खाप पंचायातों के समर्थन में खड़े होकर हरियाणा की राजनीति में जाटों को साथ लेने का दांव चलने वाले चौटाला को उस समय करारा झटका लगा जब केन्द्रिय गृह मंत्रालय ने पानी दिया। गृह मंत्रालय ने चौटाला की इस बात का पुरजोर विरोध करते हुए कहा कि गृह मंत्री पी. चिंदबरम से मुलाकात के दौरान चौटाला ने गोत्र के अंदर विवाह पर रोक लगाने के बारे में किसी प्रकार का कोई विचार- विमार्श किया था। गृह मंत्रालय के अनुसार ऐसी कोई भी चर्चा चिदंबरम और चौटाला के बीच नहीं हुई। जबकि हरियाणा में चौटाला ने खुलकर ये ऐलान किया था कि चिदंबरम से मुलाकात के दौरान उन्होंने खाप पंचायतों और गोत्र विवाह का मामला उठाया था। असल में चौटाला ये अच्छी तरह से जानते हैं कि हरियाणा में जाटों का वोट बैंक कितना बड़ा है। चौटाला के इस दांव से कांग्रेस में भी हलचल मची हुई थी। चौटाला ने यह भी कहा था कि जो लोग गोत्र विवाह औऱ खाप पंचायतों के मुद्दे का समर्थन कर रहे हैं उन सभी को एक साथ आना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि गोत्र विवाह के संबंध में हरियाणा और कांग्रेस सरकार को एक विधेयक लाना चाहिए और उसका समर्थन इनेलो भी करेगा। एक प्रकार से चौटाला ने इस मुद्दे पर कांग्रेस को जाटों के बीच कटघरे में खड़ा करने की चाल चली थी। लेकिन कांग्रेस ने चौटाला की चाल को भांपकर उनकी चाल पर पानी फेरने में देर नहीं लगाई और साफ शब्दों में कहा कि चौटाला ने इस तरह की कोई भी बात गृह मंत्रालय से नहीं की है। इस संबंध में गृह मंत्रालय ने एक विज्ञप्ति जारी कर इस बात का खंडन किया कि चौटाला और गृह मंत्री के बीच गोत्र के अंदर विवाह करने और खाप पंचायातों के द्वारा लिए गए आंदोलन का फैसले पर उनकी कोई बात हुई है। इस पत्र में कहा गया है कि चौटाला और चिदंबरम के बीच 10 मई को जो मुलाकात हुई है वह हरियाणा के गृह राज्यमंत्री गोपाल कांडा से संबंधित है। चिदंबरम और चौटाला की मुलाकात में किसी भी अन्य मुद्दे पर बातचीत नहीं हुई।